Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 31, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
भूतता व्यतिरेकेण मूढे नात्मनि किंचन ।
ऊर्म्यादिबुद्धौ हेमेव ज्ञे नास्ति परमार्थता ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी की ष्टि से जगत की तरह अज्ञानी की दृष्टि से परमार्थ भी अत्यन्त असत् है, इसलिए उसे
परमार्थ तत्व का अस्तित्व समझना कठिन ही नहीं, बल्कि असंभव है ऐसा कहते हैं।
मूढ पुरुष आत्मा में पंचभौतिक कार्यकारण मात्र से अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानता, इसलिए
अँगूठी की बुद्धि में सुवर्ण की तरह अज्ञानी में परमार्थता नहीं है