Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 31, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
यत्र प्रबुद्धं चिद्व्योम तत्र दृश्याभिधा कृता ।
यत्र सुप्तं तु तेनैव तत्र मोक्षाभिधा कृता ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत के विषय में जागरुक "बाह्यपदार्थज्ञानरूप' जो चिदाकाश है, उसका उसीने दृश्य नाम
रखा है, अद्वितीय प्रकाशरूप अपने आत्मा में सोया हुआ यानी बाह्य उपलब्धिरहित जो चिदाकाश है,
उसका उसीने मोक्ष नाम रक्खा है । श्रुति भी है, “यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति यत्र त्वस्य
सर्व मात्मेवाऽभूत तत्केन कं पश्येत्" (जिस अवस्थामेंद्रेत-सा होता है, उस अवस्था में अन्य को अन्य
देखता है, जहाँ पर सब इसका स्वरूप ही हो गया, उस अवस्था में कोन किसको किससे देखे ?)