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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verses 46–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 31, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 46,47

संस्कृत श्लोक

न तत्केशोण्डृकं किंचित्सा हि दृष्टिस्तथा स्थिता । नेदं दृश्यमिदं किंचिदित्थं चिद्व्योम संस्थितम् ॥ ४६ ॥ सर्वत्र सर्वमिदमस्ति यथानुभूतं नो किंचन क्वचिदिहास्ति न चानुभूतम् । शान्तं सदेकमिदमाततमित्थमास्ते संत्यक्तशोकभयमेदमतस्त्वमास्स्व ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

किन्तु वह केशों का वर्तुलाकार गोला कुछ भी नहीं है, वह दृष्टि ही वैसी स्थित हे, इसी प्रकार यह दृश्य कुछ नहीं है, यह चिदाकाश ही इस प्रकार इस रूप से स्थित हे । अध्यारोपदृष्टि में सर्वगामी चिदाकाश में सबका आरोप हो सकने से सर्वत्र यथानुभूत यह सब हे । अपवाद दृष्टि में तो यह अनुभूत कहीं पर कुछ नहीं हे । इस प्रकार पूर्वोक्त दोनों प्रकारो मे यह जगत भेदरहित अतएव अद्वितीय सत्‌ पूर्ण है, इसलिए आप भी शोक, भय ओर भेद का त्याग कर पूर्ण होइये