Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 31, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
परमार्थो जगदिति रूपं वेत्ति स्वयं स्वकम् ।
यथा तैमिरिकं चक्षुः केशोण्ड्रकमिवेक्षते ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तिमिर रोग से पीडित नेत्र केशों का वर्तुलाकार गोला सा देखता है
वैसे ही अज्ञानोपहित आत्मा स्वयं अपने परमार्थ ओर जगत यों दो रूप जानता है