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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 31, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

निर्वाणमेव सर्गश्रीः सर्गश्रीरेव निर्वृतिः । नानयोः शब्दयोरर्थभेदः पर्याययोरिव ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जव एकमात्र चिदाकाश ही दृश्य है, तब सृष्टि और मोक्ष का भेद ही न रहा ऐसा कहते है । निर्वाण ही सृष्टि है तथा सृष्टि ही निर्वाण हे । घट, कलश पर्याय शब्दों के समान इन दोनों शब्दों का अर्थ भिन्न नहीं है