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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 19–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

एवं युक्तिसहस्रेण दर्शितं दृश्यतेऽपि च । सर्वैरेवानुभूतं च दर्शयिष्यामि चाधुना ॥ १९ ॥ तथेदममलं शान्तं त्रिजगत्संविदम्बरम् । इदं तत्त्वमतत्त्वादि कुतोऽत्र स्यात्कथं च वा ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे इस जगत के उत्पत्ति आदि नहीं हो सकते वैसे उत्पत्ति प्रकरण में भी अनेक युक्‍्तियों द्वारा उपपादन किया जा चुका है और आगे भी उपपादन किया जायेगा ऐसा कहते हैं। इस प्रकार हजारों युक्तियों से जगत के जन्म आदि का अभाव पहले दिखाया जा चुका है, और दिखा भी रहे है। जैसे सब विद्वानों ने उसका अनुभव किया है वैसे मैं इस त्रिजगत संविद्रूपी चिदाकाश को इस समय आपके लिए दिखाऊँगा। यह त्रिजगत शान्त, निर्मल चिदाकाश ही है, यह चित्त परमार्थस्वरूप है, इसमें मायिक आकाश आदि का सम्भव कहाँ से और कैसे हो सकता है ? प्रश्न उठता है आकाश आदि की उत्पत्ति सत्‌ से है अथवा असत्‌ से हैं ? माया से है ? आदि के दो तो अविकारी हैं, इसलिए उनसे जगत की उत्पत्ति का सम्भव नहीं है, यदि माया से जगत की उत्पत्ति मानी जाय, तो भी मिथ्या ही होगी । इसलिए परिशेष से जगत का अनुत्पत्ति पक्ष ही स्थिर रहता है । छिद्ररहित कूटस्थ नित्यचिदात्मा में छिद्रस्वरूप आकाश का हजारों घनों से भी उत्पादन नहीं हो सकता, भाव यह है