Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
त्रैलोक्यभूयोनुभवश्चिदादित्यांशुमण्डलम् ।
को वा स्वांशुमतोर्भेदो निर्विकल्पःस कथ्यताम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि को शंका करे कि जगत्बोधरूपी चैतन्य सविकल्प है और ब्रह्मचैतन्य निर्विकल्प है, इस
तरह जगद्गूपी भेद को छिपाने के लिए तत्पर हुए आपका चैतन्य में भी भेद प्राप्त हो गया । इस पर
कहते है ।
तीनों लोकों में जितना द्वैत अनुभव है, वह सब ब्रह्मचैतन्य रूप सूर्य के किरण समूह की तरह है,
अतएव वस्तुतः उससे भिन्न नहीं हे । किरण समूह ओर किरणवान का भेद कैसे हो सकता है ? विकल्पों
के मिथ्या होने पर त्रैलोक्य में जो द्वैत का अनुभव है, उसे भी निर्विकल्पक ही कहिये