Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
प्रमार्जितेऽहमित्यस्मिन्पदे स्वार्थे स्वयं विना ।
नरकस्वर्गमोक्षादितृष्णायाः कल्पनैव का ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
अहं इस अभिमान का विनाश होने पर भय, राग और मुमुक्षु से होनेवाले द्वेष ओर राग के विषयभूत
नरक, स्वर्ग और मोक्ष की तृष्णा भी हट जाती है, ऐसा कहते है ।
अहं पद तथा अहं पद के अर्थ के परिमार्जित होने पर अहंकार के बिना नरक, स्वर्ग और मोक्ष की
तृष्णा की कल्पना ही कैसे हो सकती है ?