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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 30–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verses 30–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

हृदि यावदहंभावो वारिदः प्रविजृम्भते । तावद्विकासमायाति तृष्णाकुटजमञ्जरी ॥ ३० ॥ आक्रम्य चेतनां नित्यमहंकाराम्बुदे स्थिते । जाड्यमेव स्थितिं याति न प्रकाशः कदाचन ॥ ३१ ॥ असन्नयमहंकारः स्वयं मिथ्या प्रकल्पितः । दुःखायैव न हर्षाय बालसंभ्रमयक्षवत् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जब तक हृदय में अन्धकाररूपी घनघटा आटोप के साथ विराजमान रहती है तभी तक तृष्णारूपी कुटज की मंजरी विकास को प्राप्त होती है