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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 33–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verses 33–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

मुधैव कल्पितो मोहमहंभावः प्रयच्छति । अनन्तसंसारकरं दामादिष्विव दुर्मतौ ॥ ३३ ॥ अयं सोऽहमिति स्फारान्मोहादन्यतरत्तमः । अनर्थभूतं संसारे न भूतं न भविष्यति ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञान का आवरण कर अहंकाररूपी मेघ के सदा स्थित रहने पर अज्ञान की ही जड जमती हे, ज्ञानालोक कदापि स्थिरता को प्राप्त नहीं होता, बालक के भ्रम से कल्पित यक्ष के समान स्वयं भ्रान्ति से कल्पित अतएव असत्‌ यह अहंकार दुःख के लिए ही है, इससे आनन्द कुछ भी प्राप्त नहीं होता ॥ ३ १, ३ २॥ जैसे व्यर्थ कल्पित अहंभाव ने दाम, व्याल और कट में असंख्य जन्म-मरण देनेवाला मोह उत्पन्न किया था वैसे ही व्यर्थ ही कल्पित हुआ अहंकार अभिमान से दूषित अन्तःकरण अनन्त जन्म-मरण देनेवाले मोह को उत्पन्न करता हे