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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 53–54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verses 53–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 53,54

संस्कृत श्लोक

अहंकाराभिधा या सा कल्प्यते नतु वास्तवी । पाणिपादादिमात्रोऽयमहमित्येष निश्चयः ॥ ५३ ॥ अहंकारस्तृतीयोऽसौ लौकिकस्तुच्छ एव सः । वर्ज्य एव दुरात्मासौ शत्रुरेव परः स्मृतः ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो लोग सप्तम भूमिका में स्थित हैं, उनमें अहंकार के बिना जीवन की अनुपपत्ति होने से अहंकार की केवल कल्पना होती है, वस्तुतः वह नहीं है, क्योंकि कल्पना करनेवाले और जाननेवाले जीवन्मुक्त पुरुषों द्वारा उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता, इसलिए सर्वथा असत्य होने से अहंकार इस नाममात्र के शेष रहने से वह अहंकाराभिधान मात्र है। तीसरे अहंकार को दशति है। यह हाथ-चरणादिरूप देह ही मेँ हूँ, इस प्रकार का मिथ्याभिमान तीसरा अहंकार है, वह लौकिक एवं तुच्छ ही है । यह दुष्ट अहंकार अवश्य त्याग के योग्य है, क्योकि वह पहले सिरे का शत्रु ही कहा गया है