Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एषा तावत्परित्याज्या त्यक्त्वैतां दुःखदायिनीम् ।
यथा यथा पुमांस्तिष्ठेत्परमेति तथा तथा ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यह तीसरा अहंकार त्यागने योग्य है, दुःख देनेवाले इस लौकिक
अहंकार का त्याग कर सर्वाहंभाव से या शुद्धाहंभाव से श्रवण, गुरुसेवा आदि में तत्परता से ये सात
भूमिकाओं में जिस जिस प्रकार से पुरुष स्थित रह सकता है वैसे वैसे स्वरूपसुख की अभिव्यक्ति के
उत्कर्ष प्राप्ति से परम तत्त्व को प्राप्त होता है