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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 65–66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verses 65–66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 65,66

संस्कृत श्लोक

सर्वदा सर्वयत्नेन लौकिकी दुरहंकृतिः । परमानन्दबोधाय वर्जनीयाऽनया धिया ॥ ६५ ॥ शरीरास्थामयापुण्यदुरहंकारवर्जनम् । अत्यन्तपरमं श्रेय एतदेव परं पदम् ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

पथ्य वचन सैकड़ों बार कहना चाहिए, इस न्याय से फिर देहात्मभावना के त्याग के गुणों को कहते हुए लौकिक अहंकार के त्याग की आवश्यकता दशती हैं। इस बुद्धि से तथा सदा सब प्रयत्नों से लौकिक दुष्ट अहंकार का परमानन्द के बोध के लिए त्याग करना चाहिये । शरीर में आसक्तिरूप जो दुष्ट अहंकार है, उसका त्याग अत्यन्त श्रेष्ठ कल्याण है और यही परमपद है