Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 34, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 34, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
ते हि निर्वासना एव यदा शान्तिमुपागताः ।
न तदैषां गतिर्ज्ञाता दीपानामिव शाम्यताम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि शम्बर की तरह भीम आदि का भी वैकुण्ठ आदि लोकान्तर में गमन क्यो नहीं
हुआ ? तो इस पर उसका निषेध करते हैं।
वासनारहित वे शान्ति को प्राप्त हुए तब बुझ रहे दीपकों की तरह उनकी गति किसी को मालूम नहीं
हुई । वासना ही लोकान्तरगमन का कारण है, "तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिंगं मनो यत्र निषक्तमस्य
(इसलिए वासनायुक्त पुरुष, जो कर्मफल की आसक्ति से किया, उस कर्म के साथ फल को प्राप्त
होता है, जिसमें कि इसका लिंगरूप मन पहले आसक्त हुआ ।) ऐसी श्रुति है वे वासनारहित थे,
अतएव उनकी गति किसी को ज्ञात नहीं हुई, यह अर्थ हे