Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
मनोमात्रं जगच्चक्रं मनः पर्वतमण्डलम् ।
मनो व्योम मनो देवो मनो मित्रं मनो रिपुः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
फिर-फिर उगे, इसमें क्या हानि है ? ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते है।
मनोमात्र ही जगतों का समूह है, मन ही पर्वतो का मण्डल है, मन ही आकाश है, मन ही देवता
है, मन ही मित्र है और मन ही शत्रु हे । भाव यह कि मन के पुनः-पुनः उगने पर उक्त जगत की
प्राप्ति ही नहीं है