Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 30–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
शुभवासनया चेतो महत्या जायते महत् ।
भवतीन्द्रमनोराज्य इन्द्रता स्वप्नभाङ्गरः ॥ ३० ॥
क्षुद्रवासनया चेतःक्षुद्रतामपि पेलवाम् ।
पिशाचविभ्रमात्स्वप्ने पिशाचान्निशि पश्यति ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
महती
शुभवासना से चित्त महान होता हे । मनुष्य 'मैं इन्द्र हूँ इस प्रकार का मनोरथ होने पर इन्द्रतारूपी
स्वप्न से युक्त होता है