Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
सरसि स्फारनैर्मल्ये कालुष्यं याति न स्थितिम् ।
तथैव स्फारकालुष्ये प्रसादो याति न स्थितिम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षुद्र वासना से चित्त तुच्छ क्षुद्रता को देखता है। पिशाच की भ्रान्ति से
मनुष्य रात्रि मे पिशाचो को देखता है ॥ ३ १॥
निर्मलता का सम्पादन करने पर भी फिर व्युत्थान होने पर द्वैत के दर्शन से मलिनता की प्राप्ति
होगी, ऐसी यदि कोई शंका करे, तो उस पर कहते हैं।
जैसे अत्यन्त निर्मल तालाब में मलिनता को स्थान नहीं मिलता, वैसे ही अत्यन्त मलिन तालाब में
स्वच्छता को स्थान नहीं मिलता । इस श्लोक के उत्तरार्धं से थोड़े विवेक आदि से निर्मलता की स्थिति
की प्राप्ति का वारण किया गया है