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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

किमन्यैः शास्त्रसंदर्भैः क्रियतामिदमेव तु । यद्यत्स्वाद्विह तत्सर्वं दृश्यतां विषवह्निवत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

विषयो में दोषदर्थन से घृणा भोगेच्छा की भी चिकित्सा है, ऐसा कहते है। अन्य शास्त्र निबन्धोंसे क्या करना है, एकमात्र यही कीजिये । इस लोक में जो-जो वस्तु स्वादु है, उन सबको विष अग्नि के समान देखिये