Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
आद्यन्तयोर्विनाशित्वान्मध्येऽपि तदसन्मयम् ।
अज्ञातमनसस्तेन दुःखिता हस्तसंस्थिता ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य और दृष्टि असन्मय कैसे हैं ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
आदि और अन्त में असद् होने के कारण मध्य में भी वह असन्मय ही है। इस प्रकार मन असद् है,
ऐसा जिसने नहीं जाना, उस पुरुष की दुःखिता हाथ में स्थित ही है, उसको खोजने के लिए दूर जाने की
आवश्यकता नहीं है, यह भाव है