Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
जलमन्यत्तरङ्गोऽन्य इति नानातयाऽज्ञता ।
जलमेव तरङ्गोऽयमित्येकत्वात्किल ज्ञता ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
लोकव्यवहार के समान ही शास्त्र में भी ज्ञानिता और अज्ञानिता का बोध करना चाहिये। वे कोड
अपूर्व नहीं हैं, ऐसा कहते हैं।
जल पृथक् है और तरंग पृथक् है, इस प्रकार के नानात्व से अज्ञानिता होती है । जल ही तरंग है,
इस प्रकार के एकत्व से ज्ञानिता होती है