Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
तदनादि शिवं ज्ञानं यन्मध्यं द्रष्टृदृश्ययोः ।
तस्मिन्सत्ये मनः शान्तं पांसुर्वायुक्षये यथा ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस अधिष्ठान में मन का क्षय हो जाता है, उसका स्वरूप कहते हैं।
वह वस्तु अनादि नित्य निरतिशयआनन्दरूप द्रष्टा और द्रश्य का मध्य यानी दृग्रूप ज्ञान है। उस
सत्य में मन वायु के नष्ट होने पर धूलि कणों के समान शान्त हो जाता है