Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
अवत्सलाद्यथा बन्धोः सुखदुःखैर्न लिप्यते ।
तत्त्वेन संपरिज्ञानात्तथा तत्त्वचयात्मनः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्नेह रहित बन्धु
के मिलने से पुरुष को न तो सुख होता है और न उसके वियोग से दुःख होता है वैसे ही यथार्थरूप से
ज्ञान होने के कारण भूतसमूहमात्र स्वभाववाले अपने देह पिंजर से पुरुष को न सुख होता है और न दुःख
होता है