Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
अवत्सलो यथा बन्धुररागद्वेषया धिया ।
दृश्यते पश्य तद्वत्त्वं तत्त्वं पञ्जरमात्मनः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
राग और द्वेष के रहने पर इष्ट वस्तु के वियोग से ओर अनिष्ट वस्तु की प्राप्ति से शोक होता है। राग
और ब्वेष का त्याग करके उदासीन दृष्टि से तीनों देहो को देख रहे पुरुष को उनसे शोक प्राप्ति नहीं हो
सकती, इस आशय से भी कहते हैं।
जिस बन्धु में स्नेह नहीं है, वह बन्धु जैसे रागद्वेषरहित बुद्धि से देखा जाता है वैसे ही आप पृथिवी
आदि भूततत्त्वरूप अपने त्रिविध शरीर को राग-द्वेषरहित बुद्धि से देखिये