Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 69
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
विचारणासमधिगतात्मदीपको मनस्यलं परिगलितेव धीरधीः ।
विलोकयन्क्षयभवनीरसा गतीर्गतज्वरो विलसति देहपत्तने ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
वासनाक्षय के फलों को विस्तार से कहकर उन्हीं से जीवन्मुक्ति की स्थिति दिखलाते हैं।
चित्त के सर्वथा विगलित होने पर अपने दोषों का तिरस्कार कर धीर हुई बुद्धि से युक्त तथा मृत्यु
और जन्मों में पारलैकिक ओर इहलौकिक गतियो को नीरस देख रहा पुरुष विचार द्वारा आत्मरूपी
दीपक पाकर जीवन्मुक्त ओर तापरहित होकर देहरूपी नगर में विराजमान होता हे