Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 36, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
स्वाधारैरम्बुदैः स्वस्थैर्न स्पृष्टं गगनं यथा ।
चित्स्थैः सर्गैश्चिदाधारैर्न स्पृष्टा चित्परा तथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अपने आधारभूत और अपने में स्थित मेघों से आकाश स्पृष्ट नहीं होता वैसे ही चित् में
स्थित और अन्योन्याध्यासवश चित् की आधारभूत सृष्टियों से परम चित्तव स्पृष्ट नहीं होता