Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 37, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
अन्यच्च राघव पुनः
पुनः कृत्वा कृत्वा बहुविधमिदं कर्म तरसा त्वया प्राप्यं किं तद्वद यदुचितं भूतकरणात् ।
अकर्तृत्वे वास्था भवतु तव चाप्यागमवतो भव स्वस्थः स्वच्छः स्तिमित इव निर्वातजलधिः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानितादशा में भी भौतिक शरीर ग्रहण द्वारा कर्तृत्व होने पर भूतों से भूतों का निर्माण कर
भौतिक फल प्राप्त किये जाते हैं, असंग उदासीन आत्मरूप नहीं। ज्ञान दशा में तो कर्म और उसके फल
का असंभव है, इसमें तो कहना ही क्या है ? इसलिए कर्तृत्व में आपकी आस्था होना उचित नहीं है, इस
आशय से गयो में कहे गये अर्थ के समर्थन के लिए पद्य का अवतरण करते हैं।
हे रामचन्द्रजी, और भी सुनिये, आपको कर्तुत्व के आग्रह से बार-बार कार्य करके विषयों द्वारा
देहभूतों के उपाय से अतिरिक्त क्या फल प्राप्तव्य है ? जो फल नित्य निरतिशयानन्दरूप आपके लिए
उचित हो, उसे आप कहिये । इसलिए सब कर्तृत्वाभिनिवेश का त्यागकर स्वरूपोचित अकर्तृत्व से ही
श्रुति और गुरु के वचनों से आत्मज्ञानी हुए तथा अधिकारयुक्त आपकी आस्था हो। इससे आप निर्वात
सागर की तरह निश्चल और स्वच्छ हो आत्मस्वरूप में स्थित होइये