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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 37, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

येन शब्दं रसं रूपं गन्धं जानासि राघव । सोऽयमात्मा परं ब्रह्म सर्वमापूर्य संस्थितः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि जगत्‌ ब्रह्म का विवर्त है, ऐसा चुना जाता है । प्रत्यक्‌ चैतन्य का तो वह विवर्त नहीं सुना जाता, तो इस पर प्रत्यक्‌ चैतन्य ही ब्रह्म है ऐसा दशति है । हे श्रीरामचन्द्रजी, आपको जिससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस ओर गन्ध का ज्ञान होता है वही यह प्रत्यगात्मा परब्रह्म सबको व्याप्त करके स्थित हे । येन॒ रूपरसगन्धं शब्दानूस्पशश्विमेश्ुनान । एतैनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते एतद्रे तत्‌ ॥ (जिस देहादि व्यतिरिक्त अपरोक्ष साक्षिभूत आत्मा से रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श ओर स्त्रीसंसर्गजन्य सुखविशेष को सब लोग स्पष्टरूप से जानते हैं, देह आदि से व्यतिरिक्त इसी आत्मा से देहादि लक्षण रूप आदिको भी जानते है । इस लोक में उस आत्मा से अतिरिक्त कोन वस्तु अवशिष्ट रहती है अर्थात्‌ सभी वस्तु को आत्मरूप से समझना चाहिए । जिस आत्मा से अतिरिक्त कोई वस्तु परिशिष्ट नहीं रहती, वही परमपद है) इस काठक श्रुति में ब्रह्म ही प्रत्यगात्मा कहा गया हे । यह भाव है