Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 29–30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 39, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
ब्रह्म सर्वशक्ति सर्वव्यापि सर्वगतं सर्वोहमेवेति ॥ २९ ॥
यथेन्द्रजालिनः पश्यसि चित्रा मायया क्रिया
जनयन्तः सदसत्तां नयन्त्यसच्च सत्तां नयन्ति तथैवात्मा अमायामयोऽपि मायामय इव परम ऐन्द्रजालिको घटं पटं करोति पटं च घटं करोति उपले
लतां जनयति मेरौ कनकतटे नन्दनवनमिव लतायामुपलमुत्पादयति कल्पपादपेषु रत्नस्तबकमिव व्योम्नि काननमध्यारोपयति ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय अर्धव्युत्पन्न पुरुष से कहने योग्य ब्रह्म की पूर्वोक्त सर्वशक्तिसम्पन्नता आदि और
प्रत्यगात्मा के सबमें अहंभाव के दर्शन का पहले उपदेश देते हैं।
ब्रह्म सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वव्यापक और सर्वगत है, प्रत्यगात्मा मैं ही सब हूँ, यों जानना चाहिए