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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 39, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

गन्धर्वउद्यानमिव तस्मिन् जगति भविष्यति गगने कल्पनया नगरतां जनयति नष्टच्छायाञ्जनमिव व्योम धरातलं नयतीति ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

माया से ही ब्रह्म की सर्वशक्तिता और प्रत्यगात्मा की सर्वात्मकता है, इसका स्पष्टीकरण करते हैं । हे रामचन्द्रजी, ऐन्द्रजालिकों को आप देखते हैं, जैसे वे माया द्वारा विचित्र क्रियाओं को उत्पन्न करते हुए सत्‌ को असत्‌ बना देते हैं और असत्‌ को सत्‌ बना देते हैं वैसे ही यह आत्मा भी अमायामय होता हुआ भी परम ऐन्द्रजालिक की तरह मायामय होकर घट को पट बना देता है और पट को घट बना देता है। मेरु के सुर्वणमय तट पर नन्दनवन की तरह पत्थर पर लता पैदा कर देता है, कल्प वृक्षों पर रत्न के गुच्छों की तरह लता में पत्थरों को पैदा कर देता है। आकाशमें वन का आरोप कर देता है ॥ ३ ०॥ वस्तुव्यत्यय के समान देश-काल के व्यत्यय की भी माया शक्ति से ही संभावना करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं। गन्धर्वनगर में उद्यान की तरह गगन में आगे होनेवाले उस जगत में कल्पना से नगरता को उत्पन्न करता है। आकाश को, जिसकी छायारूपी नीलता मानों नष्ट हो गई, पृथ्वी तल बना देता है