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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इन्द्रियग्रामसंग्रामसेतुना भवसागरः । तीर्यते नेतरेणेह केनचिन्नाम कर्मणा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इन्द्रियसमूह के ऊपर विजयप्राप्तिरूपी पुल से संसाररूपी सागर तरा जा सकता है, अन्य किसी भी कर्म से इसका तरण नहीं हो सकता हे ।

सर्ग सन्दर्भ

तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्ग इन्द्रिय युक्त मन ही जगत की स्थिति का मूल है, उसका समूल उच्छेद होने पर दृश्य का असंभव देखने से जगत शून्य हो जाता है, यह कथन ।