Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
दृश्यात्यन्तासंभवेन ऋते नान्येन हेतुना ।
मनःपिशाचः प्रशमं याति कल्पशतैरपि ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
तो मन की चिकित्सा के लिए कौन औषधि उपयुक्त है, ऐसी शंका होने पर कहते हैं ।
दृश्य की अत्यन्त असंभावना (बाघ) के सिवा दूसरे किसी भी उपाय से मनरूपी पिशाच का विनाश
एक कल्प में तो क्या सैकड़ों कल्पो में भी नहीं हो सकता है