Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 41, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
सत्तद्ब्रह्मेति यस्यान्तर्निश्चयः सोऽपि मोक्षभाक् ।
चलाचलाकृतिर्या या दृष्टिरावद्धभावना ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह मनन का निरास होने पर मन काष्ठरहित अग्नि की भाँति स्वयं शान्त हो जाता है, अतएव
ब्रह्म का सन्मात्ररूप से परिशेष होने पर पूर्वोक्त निश्चय के निश्चल हो जाने से पुरुषार्थ की सिद्धि होती
है, इस आशय से कहते हैं।
वह ब्रह्म सत्य है, यह निश्चय जिसके भीतर विद्यमान है, वही मोक्षभागी है।
पूर्वोक्त अर्थ को दृढ़ करने के लिए बाह्य अर्थ मनन दृष्टि की बन्धहेतुता का वर्णन करते हैं।
भावनाओं से बँधी हुई चंचल तथा अचंचल आकृतिवाली जो-जो दृष्टि है वह सम्पूर्ण जगत के
प्राणीरूपी पक्षियों के बन्धन के लिए जाल है