Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verses 25–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 41, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

जगत्पश्यत्यसक्तात्मा न स दुःखे निमज्जति । यस्यैतास्वस्वरूपासु भावना स्वात्मभावना ॥ २५ ॥ अस्वरूपस्य तस्यापि सा ह्यविद्यैव विद्यते । विकारितादयो दोषा न केचन महात्मनि ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

तो कौन निमग्न होता है, इस पर कहते हैं। मिथ्याभूत वेहेन्द्रियादि द्वेतभावनाओमे जिसकी अहंबुद्धि है, वही दुःख में है, इस आशय से कहते हैं । उस मिथ्यादर्शी पुरुष का अविद्या यानी आविद्यक दुःख में निमज्जन ही दंड है, इस आशय से कहते हैं। मिथ्यादर्शी उस पुरुष के लिए एकमात्र अविद्या ही विद्यमान है, इस महात्मा परमात्मा में विकारिता आदि कोई दोष जल में धूल की भाँति विद्यमान नहीं है