Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 41, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
परमात्मनि विद्यन्ते पयसीवेह पांसवः ।
भावनाशब्दशब्दार्थरञ्जनेयं जगद्गता ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा होने पर तो तत्त्ववेत्ता पुरुषों की पूर्वापरार्थविषयक भावना के अभाव से व्यवहार की सिद्धि
नहीं होगी। ऐसी आशंका करके कहते हैं।
जगत में प्राप्त यह भावना यानी शब्द (नाम) ओर शब्दार्थो में (पदार्थो मे) स्फटिक की भाँति
अनुरंजना केवल व्यवहार के लिए उत्पन्न हुई है। यह आत्मा से अतिरिक्त नहीं है