Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 42, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
किंचित्क्षुभितरूपा सा चिच्छक्तिश्चिन्महार्णवे ।
तन्मयी चित्स्फुरत्यच्छा तत्रैवोर्मिरिवार्णवे ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र में निर्मल तरंग समुद्र ही हे, वैसे ही चिद्रूपी महासागर
में कुछ क्षुभित रूपवाली उस जगतमयी चित्शक्ति के रूप से चिति ही स्फुरित होती हे