Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 42, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
आत्मनोऽव्यतिरिक्तैव व्यतिरिक्तेव तिष्ठति ।
आलोकश्रीरिवालोककोटरे यत्ततां गता ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐन्द्रियक वितृशक्ति परमार्थ चिति ही है, उसमें उत्पत्ति का आरोप केवल औपाधिक है, इस
आशय से कहते है।
जैसे आलोक कोटर में (सूचि आदि के छिद्र में) आलोक श्री रहती हे, वैसे ही उपाधिपरवश होकर
यह चित्शक्ति आत्मा से अभिन्न होती हुई भी भिन्न-सी हो स्थित होती है