Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 42, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
स्वसंकल्पानुसंधानात्पाशैरिव नयन्वपुः ।
कष्टमस्मिन्स्वयं बन्धमेत्यात्मा परितप्यते ॥ ३२ ॥
बद्धमस्मीति कलयद्विद्यातत्त्वं जहच्छनैः ।
अविद्यां जनयत्यन्तर्जगज्जङ्गलराक्षसीम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार राग, द्वेष आदि
शक्ति सम्पन्न मन शाखा-प्रशाखारूप से अभिमान की वृद्धि होने के कारण घन अहंकारता को प्राप्त
होकर रेशम के कीड़े के समान स्वेच्छा से बन्धन को प्राप्त होता है ॥ ३ १॥ बंशी, जाल आदि फन्दों से
अपने शरीर को मृत्यु के लिए प्राप्त कर रही मछली आदि की तरह अपने संकल्पां के अनुसंधान से
कष्टकारी बन्धन को स्वयं प्राप्त होकर मन इस लोक में परिताप को प्राप्त होता है, 'मैं बँधा हूँ", इसे
परमार्थ सत्य समझता हुआ, धीरे-धीरे पारमार्थिक आत्मरूप का त्याग करता हुआ यानी स्वप्न में भी
आत्मरूप का विचार न करता हुआ वह जगद्रूपी जंगल की राक्षसी के तुल्य जन्म, मरण आदि रूप
भ्रान्तिपरम्परा की उत्पत्ति करता है