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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 42, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

स्वसंकल्पिततन्मात्रज्वालाभ्यन्तरवर्ति च । परां विवशतामेति श्रृङ्खलाबद्धसिंहवत् ॥ ३४ ॥ विचित्रकार्यकर्तृत्वमाहरद्वासनावशात् । स्वेच्छामात्रानुरचिता दशाश्चानुपतत्तथा ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वयं संकल्पित शब्द आदि विषयरूप इन्धन से युक्त राग आदि रूप ज्वालाओं के मध्य में स्थित मन श्रृंखलाओं से धे हुए सिंह के समान बड़ी विवशता को प्राप्त होता है। वासनावश विहित-निषिद्धरूप विविध कर्मो की कर्तृता का बड़े प्रयत्न से संपादन करता हुआ तथा नाना योनिरूप नरक आदि दुर्दशाओं को और आगे कही जानेवाली एकमात्र अपनी इच्छा से रचित मनन आदि दशाओं को प्राप्त हो रहा मन बड़ी विवशता को प्राप्त होता हे