Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 42, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अन्तरब्धेर्जलं यद्वत्स्पन्दास्पन्दवदीहते । सर्वशक्तिस्तथैकत्र गच्छति स्पन्दशक्तिताम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

शक्तियों की विचित्रता सत्त आदि गुणों की वृद्धि तथा हास के परस्पर मिश्रण के तारतम्य से होती है ओर उपचय आदि राजस क्रियाशक्ति से होते हैं, इसलिए पहले क्रियाशक्ति की उत्पत्ति दिखलाते हैं । जैसे समुद्र के अन्दर जल स्पन्द और अस्पन्दरूप से अवस्थित देखा जाता है यानी किसी स्थान में स्पन्द (गतिविशिष्ट) ओर किरी स्थान में अस्पन्द (गतिरहित) देखा जाता हे, वैसे ही सर्वशक्ति ब्रह्म अस्पन्द भाव होते हुए भी किसी एक अंश में स्पन्दशक्तिरूप से आविर्भूत होता हे