Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 42, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
चित्स्पन्दवपुषस्तस्य स्पन्दस्तस्माच्चिदेव हि ।
प्रदेशाद्धनतामेति सौम्योऽब्धिश्चलनादिव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्दनरहित उस ब्रह्म का
जीवरूप चिदाभास चिद् ही है, जैसे सौम्य (निश्चल) सागर ही चलन से तरंग आदिरूप स्थूलता को
प्राप्त होता हे वैसे वह भी ओपाधिक एकदेश से घनता को प्राप्त होता हे