Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 43, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवं जीवाश्चितो भावा भवभावनयोहिताः ।
ब्रह्मणः कल्पिताकाराल्लक्षशोऽप्यथ कोटिशः ॥ १ ॥
असंख्याताः पुरा जाता जायन्ते चापि वाद्य भोः ।
उत्पतिष्यन्ति चैवाम्बुकणौघा इव निर्झरात् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार मन की स्ववन्धकता का प्रकार कह कर उस मन से उपहित चिद्रूप जीवों की जब तक
मोक्ष न हो तब तक संसार स्थिति के प्रकार की विचित्रताओ का वर्णन करनेवाले श्रीवसिष्ठजी संगति
प्रदर्शन के लिए पूर्वोक्तिजीवोत्पत्ति का दूसरे प्रकार से अनुवाद करते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, इस प्रकार चित् के ओपाधिक विभावरूप जीव संसारवासना
से लाखों ओर करोड़ों की संख्या में प्रवाहित हैं । पूर्ववासना के अनुसार कल्पित आकारवाले ब्रह्म से
पहले असंख्य जीव उत्पन्न हो चुके हैँ । आज भी उत्पन्न हो रहे हैं ओर भविष्य में भी उत्पन्न होंगे,
उससे वे यों उत्पन्न होते हैं जैसे झरने से जलबिन्दुओं की राशियाँ उत्पन्न होती है
सर्ग सन्दर्भ
बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतालीसवाँ सर्ग जीवों की कर्मगति का विस्तार से वर्णन एवं विवेक आदि के अत्यन्त दुर्लभ होने से किन्हीं -किन्हीं की मुक्ति होती है, यह वर्णन ।