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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verses 27–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 43, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 27, 28

संस्कृत श्लोक

अनन्तानन्तसंकल्पकल्पनोत्पादमायया । इन्द्रजालं वितन्वाना जगन्मयमिदं महत् ॥ २७ ॥ तावद्भ्रमन्ति संसारे वारिण्यावर्तराशयः । यावन्मूढा न पश्यन्ति स्वमात्मानमनिन्दितम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्या से, जो कि अनन्त विषयों में अनन्त संकल्प-कल्पनाओं की उत्पत्ति में हेतु है, इस जगद्रूप महान इन्द्रजाल का विस्तार कर रहे ये मूढ जीव जल में आवर्तो की तरह संसार में तब तक भटकते हैं, जब तक आनन्दित अपने स्वरूप का साक्षात्कार नहीं कर लेते