Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 43, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 43, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
कश्चिद्गन्धर्वतां याति कश्चिद्गच्छति यक्षताम् ।
कश्चित्प्रयाति सुरतां कश्चिदायाति दैत्यताम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस ब्रह्माण्ड की तरह अन्यान्य ब्रह्माण्ड में भी कर्मो की विचित्रता से जीवों की गति विचित्र ही है,
इस आशय से कहते हैं।
उन ब्रह्माण्डों में भी कोई गन्धर्व होता है, तो कोई यक्ष योनि में उत्पन्न होता है, कोई देवत्व को
प्राप्त होता है, तो कोई दैत्यता को प्राप्त होता है