Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 38–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 44, verses 38–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 38-41
संस्कृत श्लोक
प्राणापानप्रवाहाढ्यं द्रव्यैरिव विनिर्मितम् ।
रोमकोटिभिराकीर्णं द्वात्रिंशद्दशनान्वितम् ॥ ३८ ॥
त्रिस्थूणं पञ्चदैवत्यमधश्चरणलाञ्छितम् ।
पञ्चभागं नवद्वारं त्वग्लेपमसृणाङ्गकम् ॥ ३९ ॥
युक्तमङ्गुलिविंशत्या नखविंशतिलाञ्छितम् ।
द्विबाहुं द्विस्तनं द्व्यक्षं बह्वक्षिभुजमेव च ॥ ४० ॥
नीडं चित्तविहङ्गस्य नीडं मन्मथभोगिनः ।
तृष्णापिशाच्या निलयं जीवकेसरिकन्दरम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका उक्तस्वरूप करोड़ों रोमों से व्याप्त, बत्तीस दाँतों से युक्त, जंघाओं ओर रीढ़ की हड्डियों से
तीन स्तम्भवाला, पाँच प्राणो से पच देवतावाला, नीचे भाग में पैरों से युक्त, हाथ, पैर, सिर, वक्षः
स्थल ओर पेटरूप पाँच भागवाला, नेत्र, कान, नासिका आदि नौ द्वारवाला, त्वचारूपी लेपवाला,
कोमल अवयववाला, बीस अंगुलियों से युक्त, बीस नखों से चिह्नित, दो बाहुवाला, दो स्तनवाला, दो
नेत्रवाला, कभी-कभी इच्छा से बहुत नेत्र ओर भुजावाला था । वह चित्तरूपी पक्षी का घोंसला था,
कामदेवरूपी सर्प का बिल था, तृष्णारूपी पिशाचिनी का आवास था, जीवरूप सिंह की गुफा था,
अभिमान रूपी हाथी का बन्धनस्तम्भ था ओर हृदयरूपी कमल से सुशोभित था