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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 43–44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 44, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 43,44

संस्कृत श्लोक

चिन्तयामास भगवांस्त्रिकालामलदर्शनः । अस्मिन्नाकाशकुहरे तते मधुपलाञ्छिते ॥ ४३ ॥ अदृष्टपारपर्यन्ते प्रथमं किमभूदिति । इतिचिन्तितवान्ब्रह्मासद्योजातोऽमलात्मदृक् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसका [= सब ब्रह्माण्डों का ओर उनके अभिमानी हिरण्यगर्भो का काल से अपरिच्छिन्न पब्रह्मपद से ही आविर्भाव हुआ है, अतएव उनका पौर्वापर्य नहीं है, इसलिए सभी प्रथम है; इस अभिप्राय से इस प्रथम रूप से कहा है । आर-पार किसीके द्वारा नहीं देखा गया है, भोरे के तुल्य श्यामता से युक्त इस विशाल आकाश कुहर में मेरी उत्पत्ति के पहले क्या था, ऐसा विचार करने के उपरान्त तुरन्त ब्रह्मा की दृष्टि निर्मल हो गई । उन्होंने अनेक अतीत सृष्टियाँ देखी