Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 44, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
विविधविरचनैः क्रियाविलासैः कमलजरूपधरेण चेतसैव ।
रघुसुत परिकल्पनेन नीता स्थितिमतुलां जगतीह सर्गलक्ष्मीः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुकुलदीपक, विविध प्रकार की रचनाओं से पूर्ण क्रियाविलासों से ब्रह्मा का रूप धारण
करनेवाले चित्त ने ही अपनी कल्पना द्वारा यह सृष्टि शोभा इस जगत में सत्य और तुच्छ से विलक्षण
होने के कारण अनुपम स्थिति को प्राप्त की है