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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । जगत्संपन्नमेवेदं संपन्नं किंचिदेव न । शून्यमेव च भामात्रं मनोविलसितं स्थितम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा यह जगत स्थित होता हुआ कुछ भी स्थित नहीं है, क्योकि मन का विलासमात्र यह सम्पूर्णतया प्रतिभासमात्र ही स्थित हे, प्रतिभास से अतिरिक्त यह शून्य ही है

सर्ग सन्दर्भ

चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतालीसवाँ सर्ग मन का कार्य कभी सच्चा नहीं होता, कारण कि मनोरथ आदि में ऐसा देखा गया है; इसलिए मनोमय होने के कारण जगत असत्‌ है, सत्‌ ही सत्‌ है, यह वर्णन ।