Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 44, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

प्रशान्ताज्ञाननिद्रस्तु नूनं गलितभावनः । प्रबुद्धचेताः संसारस्वप्नं पश्यन्न पश्यति ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी के बीज रहनेके कारण पुनः संसारदर्शन होने पर भी ज्ञानी को पुनः संसारदर्शन की प्राप्ति नहीं होती है, ऐसा कहते हैं। जिस पुरुष की अज्ञानरूपी नींद नष्ट हो गई और वासनाएँ शान्त हो गई ऐसा प्रबुद्ध चित्तवाला पुरुष जीवन्मुक्त के व्यवहार के योग्य संसाररूपी स्वप्न को देखता हुआ भी परमार्थ-दृष्टि से नहीं देखता है