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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verses 13–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 13-15

संस्कृत श्लोक

आकाशसदृशं सर्वं कलनामात्रजृम्भितम् जगत्पश्य महाबुद्धे सुदीर्घं स्वप्नमुत्थितम् ॥ १३ ॥ न जायते न म्रियते इह किंचित्कदाचन । परमार्थेन सुमते मिथ्या सर्वं तु विद्यते ॥ १४ ॥ न वृद्धिमेति नो ह्रासं यन्न किंचित्कदाचन । किं वा तनु भवेत्तत्र कस्य का नाम खण्डना ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महामते, इस सम्पूर्ण जगत को आकाश तुल्य, अपनी कल्पनामात्र से विकसित, उत्पन्न हुए दीर्घस्वप्न के तुल्य आप देखिये । हे सुमते इस जगत में कभी भी कुछ परमार्थ दृष्टि से न उत्पन्न होता है ओर न मरता है । मिथ्यादुष्टि से तो सव कुछ होता है। जो वस्तु कभी भी न कुछ वृद्धि को ही प्राप्त होती है और न हास को प्राप्त होती है, उसमें खण्डन से (काटने से) क्या अपव्यय होगा ओर उसका खण्डन ही क्या ह ?