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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

द्विचन्द्रविभ्रमप्रख्या मनोरथवदुत्थिताः । मिथ्याज्ञानघनाः सर्वे जगत्याकारराशयः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

मनोरथ की नाई तथा दो चन्द्रमाओं के विभ्रम के तुल्य मिथ्याज्ञान से पूर्ण ये सब दृश्याकार राशियाँ जगत में उत्पन्न हुई है